और कितना करूँ इंतज़ार तेरा, ऐ शमा
अँधेरी राहों में डर सा बहुत लगता है,
तुझे क्यों नहीं एहसास होता खौफ-ए-दिल का मेरे
आता जाता हर कोई भेड़ियों सा लगता है |
और कितना करूँ इंतज़ार तेरा, ऐ ज़िन्दगी
सफ़र-ए-जिंदगानी में तन्हा सा चल रहा हूँ,
सारी दुनिया को जो रास्ता दिखाती है
मैं उसी रौशनी के ताप में जल रहा हूँ |
और कितना करूँ इंतज़ार तेरा, ऐ ख़ुशी
बस पल पल बीतती धडकनें सुना करता हूँ,
दुनिया से कितना दूर हूँ आकर ज़रा देख ले
रात-दिन बस तेरे ही ख्व़ाब बुना करता हूँ |
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अब और नहीं जीना है मन मार के ये ज़िन्दगी
अब और नहीं मरना है तिल तिल मिलती मौत भी,
क्या करूँ तू ही बता, तू ही दे जीने की वजह
मैं तो कर ही रहा हूँ, और करता रहूँगा इंतज़ार तेरा |
-----------------कोमल---------------------
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