माँ की ऊँगली पकड़ कर चलना
मिटटी में, धूल में, उलटना-पलटना
पेड़ों पर चड़ना, कभी पेड़ों से गिरना
याद है मुझको वो बचपन का मचलना |
खाने को मिलने पर खाने से भागना,
और न मिलने पर, खाने को मांगना
दिन में सोना और रातों को जागना,
याद है मुझको वो सबको सताना |
वो परियों की, राजा की, जंगल की कहानी,
वो खिलौनों में, गुड्डे-गुड़ियों में मस्त रहना,
वो दोस्तों से, भाई-बहनों से लड़ना-झगड़ना,
याद है मुझको वो बचपन का चहकना |
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मिलता वो बचपन फिर, तो अच्छा होता
दुनिया से दूर, अपनी दुनिया में मैं मस्त होता,
पर क्या करूँ कि ये अब सपने हैं सारे
बढ़ चले हम आगे, छूट गए किनारे |
1 टिप्पणी:
hmm....wowh..
n m speechless..dunno how shal i describe what m feelin afta reading this poem..
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