अंतर्मन
बात बात में घर टूटते हैं
बात बात में अश्रु घट फूटते हैं
ऐसा क्यों होता है 'कोमल'
अपने अंतर्मन से ये हम कब पूछते हैं |
खिलते फूल मुरझा जाते हैं
सपनों में खुद को, उलझा पाते हैं,
विरोध-बाग़ की ओर वो क्यों झुकते हैं
अपने अंतर्मन से ये हम कब पूछते हैं |
'तेरे-मेरे' के खेल में सब फंसे हुए हैं
माया के सर्प से सब डसे हुए हैं,
अंधकार की ओर बढ़ते कदम, कब रुकते हैं
अपने अंतर्मन से ये हम कब पूछते हैं |
==========कोमल==========
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