रविवार, 23 मई 2010

Bhavnayein....


भावनाएं मन की, कागज पर उतारी न गयी
तुम जो गए ज़िन्दगी से, ज़िन्दगी गुजारी न गयी |

हर अरमान अश्कों के साथ बहा दिए
पर तुम्हे पाने की ख्वाहिश हमारी न गयी |

तुमने रुख मोड़ दिया दिल के फ़साने का 
हम तड़प के ही रह गए, पर सवारी न गयी |

दामन छुड़ा के तुम सोचते हो, दिल से चले गए
इतनी गहराई तक तो कोई कटारी न गयी |

इलाज चाहे जो कर लो इस नामुराद का
दिल से तेरे इश्क की बीमारी न गयी |

...................कोमल......................

Bachpan

"बचपन"

माँ की ऊँगली पकड़ कर चलना
   मिटटी में, धूल में, उलटना-पलटना
पेड़ों पर चड़ना, कभी पेड़ों से गिरना
   याद है मुझको वो बचपन का मचलना |

खाने को मिलने पर खाने से भागना,
और न मिलने पर, खाने को मांगना
दिन में सोना और रातों को जागना,
याद है मुझको वो सबको सताना |

वो परियों की, राजा की, जंगल की कहानी,
वो खिलौनों में, गुड्डे-गुड़ियों में मस्त रहना,
वो दोस्तों से, भाई-बहनों से लड़ना-झगड़ना,
याद है मुझको वो बचपन का चहकना |
....................................

मिलता वो बचपन फिर, तो अच्छा होता
दुनिया से दूर, अपनी दुनिया में मैं मस्त होता,
पर क्या करूँ कि ये अब सपने हैं सारे
बढ़ चले हम आगे, छूट गए किनारे |

***********कोमल*************

Antarman

अंतर्मन

बात बात में घर टूटते हैं 
बात बात में अश्रु घट फूटते हैं
ऐसा क्यों होता है 'कोमल'
अपने अंतर्मन से ये हम कब पूछते हैं |

खिलते फूल मुरझा जाते हैं
सपनों में खुद को, उलझा पाते हैं,
विरोध-बाग़ की ओर वो क्यों झुकते हैं
अपने अंतर्मन से ये हम कब पूछते हैं |

'तेरे-मेरे' के खेल में सब फंसे हुए हैं
माया के सर्प से सब डसे हुए हैं,
अंधकार की ओर बढ़ते कदम, कब रुकते हैं
अपने अंतर्मन से ये हम कब पूछते हैं |

==========कोमल==========