सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

Ummeed - Meri Pehli Kavita

उम्मीद

सपनों के शहर में जी रहे हैं आज सब
अपलक नज़रों में कुछ विश्वास अब भी है,
कभी न कभी तो स्थिति बदलेगी
दिलों में यह एहसास अब भी है |
अपलक नज़रों में ...........................


आज भ्रष्टाचार के बीच आम इंसान कैसे जिए
संदेह और अविश्वास के बीच आम इंसान कैसे जिए,
राजदारों को भी समझ नहीं पाते है हम
स्वतंत्र होते हुए हम दास अब भी हैं |
अपलक नज़रों में ...........................

अपने परायों का भेद सभी करते हैं
फिर भी अपनों को छोड़ परायों को अनुसरते हैं,
इंसान के हालात उस जुआरी जैसे हैं
हारने के बाद जिसके हाथों में ताश अब भी है |
अपलक नज़रों में ...........................

कभी तो होगी साँसों को आज़ादी
कभी तो होगी भ्रष्टों की बर्बादी,
उम्मीद लगाए बैठी है, जो सहते हुए अत्याचार
इस शहर में ऐसे लोगों की आस अब भी है |
अपलक नज़रों में ...........................


कभी न कभी तो स्थिति बदलेगी
दिलों में यह एहसास अब भी है |


-------------कोमल------------

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